Tuesday, 21 February 2017

Dooriyan



दूरियाँ

दूरी- ना जाने कितने रूप, कितने रंग में ये आती है
कभी अपने होने से , और कभी ना होने से, क्या दर्द ये दे जाती है...

ना मांगी थी वह दूरी जो पैदाइश के तोहफे में मिली
माँ का साया छूटा, यतीमी के बाहों में पली।
सात समुन्दर पार जो ससुराल बना मेरा,
रहे कुचे अपनों का भी साथ छूटा मेरा ।

और एक मैं हूँ जिसने अपने अब्बा को देखा तक नहीं
टूट के चाहा जिस माँ को, बिछड़ गयी वो ज़िन्दगी में कहीं।
धीरे धीरे कर भाई बेहेन भी छोड़ गए,
रंजिश ऐसी पड़ी के दिल के सुकून, सितमगर हो गए ।

इन दूरियों में उलझे ही बीत गयी पूरी हयात
अपनों को कर पराये, परायों से हुए हमनवाज़।
कुछ से मिली ख़ुशी तोह ज़्यादा दे गए ग़म
वक़्त और फास्लो की दूरियों में अकेले रह गए हम ।

चाँद तारे हमारे अब पिघलने लगे हैं
आखरी मोड़ पर खड़े अलविदा कहने लगे हैं,
मौत से लाई दूरियां हर दिल चाहे मिट जाएँ
ज़िंदा दिलों की दूरियों को कौन मिटाये? कौन मिटाये? 


~अलमास किरन शमीम 

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Now reading ... "Crime and Punishment" by 'Fyodor Dostoyevsky'.

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